Thursday, August 6, 2020

Importance of Diwali

Secret of Diwali

रामायण के माध्यम से इतना तो हम सब जानते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी जी अयोध्या के राजा दशरथ जी के जयंती पुत्र थे, जिन्होंने माता कौशल्या के गर्भ से जन्म लिया। राजा दशरथ ने शिकार करते समय धोके से श्रवण कुमार की हत्या कर दी थी। इस कारण श्रवण कुमार के माता पिता ने दशरथ जी को श्राप दे दिया कि जिस तरह हम पुत्र वियोग में तड़फ तड़फ कर मर रहे हैं वह भी ऐसे ही मरेगा। श्राप फला कैकेयी के कारण श्रीरामचन्द्रजी को 14 वर्ष का वनवास मिला और पुत्र वियोग में दशरथ के प्राण निकले।






















Shri Ram
श्री

क्या श्रीरामचंद्रजी को भी श्राप लगा दिया गया था?
जी हाँ! श्रीरामचन्द्रजी जी श्री विष्णु जी के अवतार है। 
एक बार नारद जी को विवाह करने की प्रेरणा हुई। राजा जी लड़की का स्वयंवर था। नारद जी विष्णु जी के पास गए और हरि मुख की माँग की। इसलिए सुंदर दिखू और शादी हो। नारद जी ने हरी मुख का आशीर्वाद दे दिया। नारद जी के हरी (बंदर) मुख लग गए। हरि का पर्यायवाची बंदर भी होता है। नारद को देखकर सब हला हुआ, विवाह भी नहीं हुआ तब नारद जी ने क्रोधित होकर श्राप दे दिया कि आप भी एक जन्म पत्नी के वियोग में तड़पेगे।

श्रीरामचंद्रजी का विवाह हुआ। विवाह होते ही वनवास मिला। वनवास के समय रावण आया और धोके से सीता हरण कर लिया।
श्रीरामचन्द्रजी सीता जी की तलाश में रोते हुए इधर उधर भक्तते रहे। बाद में सुग्रीव और हनुमान जी का सहयोग मिला। सीता जी का पता चला। परमात्मा मुनिंद्र जी के आशीर्वाद से नल नील ने पुल (राम सेतु) बनाया। लंका पहुँचे, युद्ध हुआ। रावण की मृत्यु हुई। करोड़ो व्यक्ति मारे गए। कई बहन बेटियों विधवा हो गयी। तब जाकर सीता जी को वापस लाया गया। इसी उपलक्ष्य में दिवाली / दीपावली मनाई जाती है।

लेकिन दीपावली कितनी सही है?
वर्तमान में दीवाली मनाना उचित है या अनुचित?
अयोध्या में दीवाली कब तक मनाई गई?
सीता जी का मान हुआ या अपमान?
श्रीरामचंद्रजी मूल भगवान क्या है?
असली / अविनाशी भगवान कौन है?

सीता जी की गलती यह थी कि उसने लक्षण रेखा पार की।
श्रीरामचंद्रजी श्री विष्णु जी के अवतार थे। पूर्ण परमात्मा / अविनाशी परमात्मा नहीं थे। अंतर्यामी भी नहीं थे।

आप स्वयं निर्णय लें!

रावण का मामा स्वर्ण का मृग बन गया, उसकी माया को श्रीरामचंद्रजी नहीं पहचान सके।
सीता जी को कौन, कहा ले गया है ये भी श्रीरामचंद्रजी को नहीं पता था।
श्रीरामचन्द्रजी जी बाली को नहीं हरा सकते थे। इसलिए धोके से मारा गया और इसका कर्म भी उन्हें श्रीकृष्ण के जन्म में भोगना पड़ा। बाली वाली आत्मा शिकारी बना और श्रीकृष्ण जी के पैर में धोके से तीर मारकर हत्या की।
श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण को ठीक नहीं कर सकते थे। संजीवनी बूटी मंगाई गई।
नागफस से गरुड़ जी ने श्रीरामचन्द्रजी सहित उनकी सेना की जान बचाई।
श्रीरामचन्द्रजी से रावण की मृत्यु नहीं हो रही थी। विभीषण और परमात्मा के सहयोग से रावण का वध हुआ।

माता सीता जी की अग्नि परीक्षा इस आधार पर की गई कि सीता जी ने रावण से संबंधित नहीं बनाया।
माता सीता अग्नि परीक्षा में सफल हुई। वे पवित्र थे, तटस्थकलंक थे। रावण को भी श्राप लगा हुआ था कि किसी परस्त्री के साथ जबर्दस्ती सम्बन्ध बनायेगा तो तेरी मृत्यु हो जाएगी।

14 वर्ष उपरांत श्रीरामचन्द्रजी अयोध्या लौटेअयोध्या वासियों ने घी के दीपक जलाये। 
दीपावली मनाई गयी।

एक दिन राजा रामचंद्रजी रात्रि में अयोध्या वासियों के सुख दुःख की जानकारी के लिए रात्रि में भेष बदलकर घूम रहे थे। एक धोबी अपनी पत्नी को लड़ रहा था क्योकि उसकी पत्नी रूठ कर एक दिन के लिए घर से बाहर (अपनी बहन के घर) चली गई थी। इसी कारण वह उसको पीट रहा था और बोल रहा था कि मैं अयोध्या वाला श्रीराम चन्द्र नहीं जी रावण के पास रहने के बाद भी सीता को घर ले आया था।
यह बात श्रीरामचन्द्रजी के चुभ गयी। और उन्होंने सीता जी को घर से निकालने का आदेश दे दिया। सीता जी गिड़गिड़ाती रही। बोलती रही कि मैंने अग्नि परीक्षा दी है स्वामी, मैं तटस्थकलंक हूँ। लेकिन श्रीरामचंद्रजी ने एक न सुनी। रामचंद्र जी ने इतना भी नहीं देखा कि ये गर्भवती हैं, कहा जाएंगी! जनता ताने देती है तो इसमें सीता जी की क्या गलती है। श्रीराम चन्द्र जी तो मर्यादा पुरुषोत्तम भी नहीं थे। यदि वे मर्यादा पुरुषोत्तम होते हैं तो गर्भवती सीता जी को घर से नहीं निकालते। और यदि जनता के तानों की ही चिंता थी तो माता सीता को साथ में राज बलिदान के बारे में। इतना भी नहीं सोचा कि अब नाला न जंगल में कहा जाए।
ऋषि वाल्मिकी जी ने सीता जी को सहारा दिया। बेटी की तरह पालन किया।
लव कुश ने श्रीरामचंद्रजी के अवश्मेघ यज्ञ को स्वीकार किया। श्रीरामचंद्रजी के छक्के छुड़ाए सहित सेना। श्रीरामचन्द्रजी अपने पुत्रों को पहचान नहीं सके।
अंत में सीता जी से भी नहीं मिल सके। नारद जी के श्राप के कारण आजीवन पत्नी वियोग में पड़पते रहे और अंत में सरयू नदी में जल समाधि के बारे में प्राण त्याग दिए।

आपको जानकर हैरानी होगी कि अयोध्या में केवल दो साल दीवाली मनायी गयी। श्रीरामचन्द्रजी जी के इस कृत्य (सीता जी निकलने) से अयोध्या वासियों को बहुत दुःख हुआ। 
इसके बाद द्वापर में भी दीवाली नहीं मनाई गयी। कलूँ में स्वार्थी और नकली गुरुओं ने इस पाखण्ड को शुरू किया। और सीता जी के बलिदान / दुःख का मजाक शुरू किया।

आप इतना तो समझ गए होंगे जी अयोध्या नरेश श्रीरामचंद्रजी तो पूर्ण परमात्मा / अविनाशी भगवान नहीं हैं।
तो फिर पूर्ण भगवान / आदि राम कौन है जिसने रचना की रचना की है?
कौन हैं असली राम ⁉️🤔
एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घट घट में बैठा।
एक राम का सकल पसारा, एक राम जग से न्यारा ।।


कबीर भगवान ही पूर्ण भगवान / आदि राम ने सब सृष्टि रचना की है। जिनके बारे में कहा जाता है कि सबका मालिक एक है।
पूर्ण परमात्मा कविर्देव / कबीर साहेब चारों युगों (सत, त्रेतागो, द्वापर पीठ, कलगो) में आता है। माँ के गर्भ से जन्म नहीं लेता है। सशरीर आता है, सशरीर जाता है। ना उनका जन्म होता है ना मृत्यु होती है। यही अविनाशी परमात्मा की पहचान होती है 
कबीर साहेब सतना में सतसुकृत नाम से आये थे, त्रेतागो में मुनिंद्र ऋषि नाम से आये थे। तब रावण की पत्नी मन्दोत्री, विभीषण, नल-नील, हनुमानजी सहित कई पुण्यदल ने नाम दीक्षा के बारे में कल्याण का मार्ग अपनाया था।
कबीर भगवान द्वापरगो में करुणामय नाम से आये थे। और कलगो में असली नाम कबीर नाम से आता है। सन्त गरीबदासजी, धर्मदासजी जी, रामानन्द जी, मलूक़दसजी, नानकदेवजी इत्यादि कबीर परमेश्वर के साक्षी बने। परमात्मा ने इन पुण्यिल को सतलोक दिखाया। फिर उन्होंने कबीर परमात्मा की पेंसिल तोड़ महिमा गायी।
कबीर परमात्मा के प्रमाण गीता, क़ुरान, वेद, गुरुग्रंथ साहिब, बाइबल इत्यादि पवित्र मेग्रथों में भी मिलते हैं।
पूर्ण भगवान की शास्त्र विधि अनुसार सद्भक्ति की जानकारी के लिए अवश्य देखे साधना गृह शाम 7:30 से 8:30 बजे तक। सीता जी का पता चला। परमात्मा मुनिंद्र जी के आशीर्वाद से नल नील ने पुल (राम सेतु) बनाया। लंका पहुँचे, युद्ध हुआ। रावण की मृत्यु हुई। करोड़ो व्यक्ति मारे गए। कई बहन बेटियों विधवा हो गयी। तब जाकर सीता जी को वापस लाया गया। इसी उपलक्ष्य में दिवाली / दीपावली मनाई जाती है।

लेकिन दीपावली कितनी सही है?
वर्तमान में दीवाली मनाना उचित है या अनुचित?
अयोध्या में दीवाली कब तक मनाई गई?
सीता जी का मान हुआ या अपमान?
श्रीरामचंद्रजी मूल भगवान क्या है?
असली / अविनाशी भगवान कौन है?

सीता जी की गलती यह थी कि उसने लक्षण रेखा पार की।
श्रीरामचंद्रजी श्री विष्णु जी के अवतार थे। पूर्ण परमात्मा / अविनाशी परमात्मा नहीं थे। अंतर्यामी भी नहीं थे।

आप स्वयं निर्णय लें

रावण का मामा स्वर्ण का मृग बन गया, उसकी माया को श्रीरामचंद्रजी नहीं पहचान सके।
सीता जी को कौन, कहा ले गया है ये भी श्रीरामचन्द्रजी को नहीं पता था।
श्रीरामचन्द्रजी जी बाली को नहीं हरा सकते थे। इसलिये धोखे से मारा और इसका कर्म भी उनको श्रीकृष्ण के जन्म में भोगना पड़ा था। बाली वाली आत्मा शिकारी बना और श्रीकृष्ण जी के पैर में धोखे से तीर मारकर हत्या की।
श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण को ठीक नहीं कर सकते थे। संजीवनी बूटी मंगाई गई।
नागफास से गरुड़ जी ने श्रीरामचन्द्रजी सहित उनकी सेना की जान बचाई।
श्रीरामचन्द्रजी से रावण की मृत्यु नहीं हो रही थी। विभीषण और परमात्मा के सहयोग से रावण का वध हुआ।

माता सीता जी की अग्नि परीक्षा इस आधार पर की गई कि सीता जी ने रावण से सम्बंध नहीं बनाया।
माता सीता अग्नि परीक्षा में सफल हुई। वे पवित्र थी। रावण को भी श्राप लगा हुआ था कि किसी परस्त्री के साथ जबर्दस्ती सम्बन्ध बनायेगा तो तेरी मृत्यु हो जायेगी।

14 वर्ष उपरांत श्रीरामचन्द्रजी अयोध्या लौटे। अयोध्या वासियों ने घी के दीपक जलाये। 
दीपावली मनाई गयी।

एक दिन राजा रामचंद्रजी रात्रि में अयोध्या वासियों के सुख दुःख की जानकारी के लिये रात्रि में भेष बदलकर घूम रहे थे। एक धोभी अपनी पत्नी को लड़ रहा था क्योकि उसकी पत्नी रूठ कर एक दिन के लिये घर से बाहर(अपनी बहन के घर) चली गयी थी। इसी कारण वह उसको पीट रहा था और बोल रहा था कि मैं अयोध्या वाला रामचन्द नहीं जी रावण के पास रहने के बाद भी सीता को घर ले आया।
यह बात श्रीरामचन्द्रजी के चुभ गयी। और उन्होंने सीता जी को घर से निकालने का आदेश दे दिया। सीता जी गिड़गिड़ाती रही। बोलती रही कि मैंने अग्नि परीक्षा दी है स्वामी, मैं निष्कलंक हूँ। लेकिन श्रीरामचन्द्रजी ने एक न सुनी। रामचन्द्र जी ने इतना भी नहीं देखा कि ये गर्भवती है, कहा जायेगी! जनता ताने देती है तो इसमें सीता जी की क्या गलती है। श्रीराम चन्द्र जी तो मर्यादा पुरुषोत्तम भी नहीं थे। यदि वे मर्यादा पुरुषोत्तम होते तो गर्भवती सीता जी को घर से नहीं निकालते। और यदि जनता के तानों की ही चिंता थी तो माता सीता को साथ में लेकर राज त्यागते। इतना भी नहीं सोचा कि अबला नारी जंगल में कहा जायेगी।
ऋषि वाल्मिकी जी ने सीता जी को सहारा दिया। बेटी की तरह पालन किया।
लव कुछ ने श्रीरामचन्द्रजी के अवश्मेघ यज्ञ को स्वीकार किया। सेना सहित श्रीरामचन्द्रजी के छक्के छुड़ा दिये। श्रीरामचन्द्रजी अपने पुत्रों को नहीं पहचान सके।
अंत में सीता जी से भी नहीं मिल सके। नारद जी के श्राप के कारण आजीवन पत्नी वियोग में पड़पते रहे और अंत में सरयू नदी में जल समाधि के बारे में प्राण त्याग दिए।

आपको जानकर हैरानी होगी कि अयोध्या में केवल दो साल दीवाली मनायी गयी। श्रीरामचन्द्रजी जी इस कृत्य (सीता जी निकलने) से अयोध्या वासियों को बहुत दुःख हुआ। 
इसके बाद द्वापर में भी दीवाली नहीं मनाई गयी। कलूँ में स्वार्थी और नकली गुरुओं ने इस पाखण्ड को शुरू किया। और सीता जी बलिदान / दुःख का मजाक शुरू किया।

आप इतना तो समझ गए होंगे जी अयोध्या नरेश श्रीरामचंद्रजी तो पूर्ण परमात्मा / अविनाशी भगवान नहीं हैं।
तो फिर पूर्ण भगवान / आदि राम कौन है जिसने रचना की रचना की है?
कौन हैं असली राम ⁉️🤔
एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घट घट में बैठा।
एक राम का सकल पसारा, एक राम जग से न्यारा ।।

कबीर भगवान ही पूर्ण भगवान / आदि राम ने सब सृष्टि रचना की है। जिनके बारे में कहा जाता है कि सबका मालिक एक है।
पूर्ण परमात्मा कविर्देव / कबीर साहेब चारों युगों (सत, त्रेतागो, द्वापर पीठ, कलगो) में आता है। माँ के गर्भ से जन्म नहीं लेता है। सशरीर आता है, सशरीर जाता है। ना उनका जन्म होता है ना मृत्यु होती है। यही अविनाशी परमात्मा की पहचान होती है 
कबीर साहेब सतना में सतसुकृत नाम से आये थे, त्रेतागो में मुनिंद्र ऋषि नाम से आये थे। तब रावण की पत्नी मन्दोत्री, विभीषण, नल-नील, हनुमानजी सहित कई पुण्यदल ने नाम दीक्षा के बारे में कल्याण का मार्ग अपनाया था।
कबीर भगवान द्वापरगो में करुणामय नाम से आये थे। और कलगो में असली नाम कबीर नाम से आता है। सन्त गरीबदासजी, धर्मदासजी जी, रामानन्द जी, मलूक़दसजी, नानकदेवजी इत्यादि कबीर परमेश्वर के साक्षी बने। परमात्मा ने इन पुण्यिल को सतलोक दिखाया। फिर उन्होंने कबीर परमात्मा की पेंसिल तोड़ महिमा गायी।
कबीर परमात्मा के प्रमाण गीता, क़ुरान, वेद, गुरुग्रंथ साहिओब, बाइबल इत्यादि पवित्र मेग्रथों में भी मिलते हैं।
पूर्ण भगवान की शास्त्र विधि अनुसार सद्भक्ति की जानकारी के लिए अवश्य देखे साधना गृह शाम 7:30 से 8:30 बजे तक।

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