Thursday, August 6, 2020

Importance of Diwali

Secret of Diwali

रामायण के माध्यम से इतना तो हम सब जानते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी जी अयोध्या के राजा दशरथ जी के जयंती पुत्र थे, जिन्होंने माता कौशल्या के गर्भ से जन्म लिया। राजा दशरथ ने शिकार करते समय धोके से श्रवण कुमार की हत्या कर दी थी। इस कारण श्रवण कुमार के माता पिता ने दशरथ जी को श्राप दे दिया कि जिस तरह हम पुत्र वियोग में तड़फ तड़फ कर मर रहे हैं वह भी ऐसे ही मरेगा। श्राप फला कैकेयी के कारण श्रीरामचन्द्रजी को 14 वर्ष का वनवास मिला और पुत्र वियोग में दशरथ के प्राण निकले।






















Shri Ram
श्री

क्या श्रीरामचंद्रजी को भी श्राप लगा दिया गया था?
जी हाँ! श्रीरामचन्द्रजी जी श्री विष्णु जी के अवतार है। 
एक बार नारद जी को विवाह करने की प्रेरणा हुई। राजा जी लड़की का स्वयंवर था। नारद जी विष्णु जी के पास गए और हरि मुख की माँग की। इसलिए सुंदर दिखू और शादी हो। नारद जी ने हरी मुख का आशीर्वाद दे दिया। नारद जी के हरी (बंदर) मुख लग गए। हरि का पर्यायवाची बंदर भी होता है। नारद को देखकर सब हला हुआ, विवाह भी नहीं हुआ तब नारद जी ने क्रोधित होकर श्राप दे दिया कि आप भी एक जन्म पत्नी के वियोग में तड़पेगे।

श्रीरामचंद्रजी का विवाह हुआ। विवाह होते ही वनवास मिला। वनवास के समय रावण आया और धोके से सीता हरण कर लिया।
श्रीरामचन्द्रजी सीता जी की तलाश में रोते हुए इधर उधर भक्तते रहे। बाद में सुग्रीव और हनुमान जी का सहयोग मिला। सीता जी का पता चला। परमात्मा मुनिंद्र जी के आशीर्वाद से नल नील ने पुल (राम सेतु) बनाया। लंका पहुँचे, युद्ध हुआ। रावण की मृत्यु हुई। करोड़ो व्यक्ति मारे गए। कई बहन बेटियों विधवा हो गयी। तब जाकर सीता जी को वापस लाया गया। इसी उपलक्ष्य में दिवाली / दीपावली मनाई जाती है।

लेकिन दीपावली कितनी सही है?
वर्तमान में दीवाली मनाना उचित है या अनुचित?
अयोध्या में दीवाली कब तक मनाई गई?
सीता जी का मान हुआ या अपमान?
श्रीरामचंद्रजी मूल भगवान क्या है?
असली / अविनाशी भगवान कौन है?

सीता जी की गलती यह थी कि उसने लक्षण रेखा पार की।
श्रीरामचंद्रजी श्री विष्णु जी के अवतार थे। पूर्ण परमात्मा / अविनाशी परमात्मा नहीं थे। अंतर्यामी भी नहीं थे।

आप स्वयं निर्णय लें!

रावण का मामा स्वर्ण का मृग बन गया, उसकी माया को श्रीरामचंद्रजी नहीं पहचान सके।
सीता जी को कौन, कहा ले गया है ये भी श्रीरामचंद्रजी को नहीं पता था।
श्रीरामचन्द्रजी जी बाली को नहीं हरा सकते थे। इसलिए धोके से मारा गया और इसका कर्म भी उन्हें श्रीकृष्ण के जन्म में भोगना पड़ा। बाली वाली आत्मा शिकारी बना और श्रीकृष्ण जी के पैर में धोके से तीर मारकर हत्या की।
श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण को ठीक नहीं कर सकते थे। संजीवनी बूटी मंगाई गई।
नागफस से गरुड़ जी ने श्रीरामचन्द्रजी सहित उनकी सेना की जान बचाई।
श्रीरामचन्द्रजी से रावण की मृत्यु नहीं हो रही थी। विभीषण और परमात्मा के सहयोग से रावण का वध हुआ।

माता सीता जी की अग्नि परीक्षा इस आधार पर की गई कि सीता जी ने रावण से संबंधित नहीं बनाया।
माता सीता अग्नि परीक्षा में सफल हुई। वे पवित्र थे, तटस्थकलंक थे। रावण को भी श्राप लगा हुआ था कि किसी परस्त्री के साथ जबर्दस्ती सम्बन्ध बनायेगा तो तेरी मृत्यु हो जाएगी।

14 वर्ष उपरांत श्रीरामचन्द्रजी अयोध्या लौटेअयोध्या वासियों ने घी के दीपक जलाये। 
दीपावली मनाई गयी।

एक दिन राजा रामचंद्रजी रात्रि में अयोध्या वासियों के सुख दुःख की जानकारी के लिए रात्रि में भेष बदलकर घूम रहे थे। एक धोबी अपनी पत्नी को लड़ रहा था क्योकि उसकी पत्नी रूठ कर एक दिन के लिए घर से बाहर (अपनी बहन के घर) चली गई थी। इसी कारण वह उसको पीट रहा था और बोल रहा था कि मैं अयोध्या वाला श्रीराम चन्द्र नहीं जी रावण के पास रहने के बाद भी सीता को घर ले आया था।
यह बात श्रीरामचन्द्रजी के चुभ गयी। और उन्होंने सीता जी को घर से निकालने का आदेश दे दिया। सीता जी गिड़गिड़ाती रही। बोलती रही कि मैंने अग्नि परीक्षा दी है स्वामी, मैं तटस्थकलंक हूँ। लेकिन श्रीरामचंद्रजी ने एक न सुनी। रामचंद्र जी ने इतना भी नहीं देखा कि ये गर्भवती हैं, कहा जाएंगी! जनता ताने देती है तो इसमें सीता जी की क्या गलती है। श्रीराम चन्द्र जी तो मर्यादा पुरुषोत्तम भी नहीं थे। यदि वे मर्यादा पुरुषोत्तम होते हैं तो गर्भवती सीता जी को घर से नहीं निकालते। और यदि जनता के तानों की ही चिंता थी तो माता सीता को साथ में राज बलिदान के बारे में। इतना भी नहीं सोचा कि अब नाला न जंगल में कहा जाए।
ऋषि वाल्मिकी जी ने सीता जी को सहारा दिया। बेटी की तरह पालन किया।
लव कुश ने श्रीरामचंद्रजी के अवश्मेघ यज्ञ को स्वीकार किया। श्रीरामचंद्रजी के छक्के छुड़ाए सहित सेना। श्रीरामचन्द्रजी अपने पुत्रों को पहचान नहीं सके।
अंत में सीता जी से भी नहीं मिल सके। नारद जी के श्राप के कारण आजीवन पत्नी वियोग में पड़पते रहे और अंत में सरयू नदी में जल समाधि के बारे में प्राण त्याग दिए।

आपको जानकर हैरानी होगी कि अयोध्या में केवल दो साल दीवाली मनायी गयी। श्रीरामचन्द्रजी जी के इस कृत्य (सीता जी निकलने) से अयोध्या वासियों को बहुत दुःख हुआ। 
इसके बाद द्वापर में भी दीवाली नहीं मनाई गयी। कलूँ में स्वार्थी और नकली गुरुओं ने इस पाखण्ड को शुरू किया। और सीता जी के बलिदान / दुःख का मजाक शुरू किया।

आप इतना तो समझ गए होंगे जी अयोध्या नरेश श्रीरामचंद्रजी तो पूर्ण परमात्मा / अविनाशी भगवान नहीं हैं।
तो फिर पूर्ण भगवान / आदि राम कौन है जिसने रचना की रचना की है?
कौन हैं असली राम ⁉️🤔
एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घट घट में बैठा।
एक राम का सकल पसारा, एक राम जग से न्यारा ।।


कबीर भगवान ही पूर्ण भगवान / आदि राम ने सब सृष्टि रचना की है। जिनके बारे में कहा जाता है कि सबका मालिक एक है।
पूर्ण परमात्मा कविर्देव / कबीर साहेब चारों युगों (सत, त्रेतागो, द्वापर पीठ, कलगो) में आता है। माँ के गर्भ से जन्म नहीं लेता है। सशरीर आता है, सशरीर जाता है। ना उनका जन्म होता है ना मृत्यु होती है। यही अविनाशी परमात्मा की पहचान होती है 
कबीर साहेब सतना में सतसुकृत नाम से आये थे, त्रेतागो में मुनिंद्र ऋषि नाम से आये थे। तब रावण की पत्नी मन्दोत्री, विभीषण, नल-नील, हनुमानजी सहित कई पुण्यदल ने नाम दीक्षा के बारे में कल्याण का मार्ग अपनाया था।
कबीर भगवान द्वापरगो में करुणामय नाम से आये थे। और कलगो में असली नाम कबीर नाम से आता है। सन्त गरीबदासजी, धर्मदासजी जी, रामानन्द जी, मलूक़दसजी, नानकदेवजी इत्यादि कबीर परमेश्वर के साक्षी बने। परमात्मा ने इन पुण्यिल को सतलोक दिखाया। फिर उन्होंने कबीर परमात्मा की पेंसिल तोड़ महिमा गायी।
कबीर परमात्मा के प्रमाण गीता, क़ुरान, वेद, गुरुग्रंथ साहिब, बाइबल इत्यादि पवित्र मेग्रथों में भी मिलते हैं।
पूर्ण भगवान की शास्त्र विधि अनुसार सद्भक्ति की जानकारी के लिए अवश्य देखे साधना गृह शाम 7:30 से 8:30 बजे तक। सीता जी का पता चला। परमात्मा मुनिंद्र जी के आशीर्वाद से नल नील ने पुल (राम सेतु) बनाया। लंका पहुँचे, युद्ध हुआ। रावण की मृत्यु हुई। करोड़ो व्यक्ति मारे गए। कई बहन बेटियों विधवा हो गयी। तब जाकर सीता जी को वापस लाया गया। इसी उपलक्ष्य में दिवाली / दीपावली मनाई जाती है।

लेकिन दीपावली कितनी सही है?
वर्तमान में दीवाली मनाना उचित है या अनुचित?
अयोध्या में दीवाली कब तक मनाई गई?
सीता जी का मान हुआ या अपमान?
श्रीरामचंद्रजी मूल भगवान क्या है?
असली / अविनाशी भगवान कौन है?

सीता जी की गलती यह थी कि उसने लक्षण रेखा पार की।
श्रीरामचंद्रजी श्री विष्णु जी के अवतार थे। पूर्ण परमात्मा / अविनाशी परमात्मा नहीं थे। अंतर्यामी भी नहीं थे।

आप स्वयं निर्णय लें

रावण का मामा स्वर्ण का मृग बन गया, उसकी माया को श्रीरामचंद्रजी नहीं पहचान सके।
सीता जी को कौन, कहा ले गया है ये भी श्रीरामचन्द्रजी को नहीं पता था।
श्रीरामचन्द्रजी जी बाली को नहीं हरा सकते थे। इसलिये धोखे से मारा और इसका कर्म भी उनको श्रीकृष्ण के जन्म में भोगना पड़ा था। बाली वाली आत्मा शिकारी बना और श्रीकृष्ण जी के पैर में धोखे से तीर मारकर हत्या की।
श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण को ठीक नहीं कर सकते थे। संजीवनी बूटी मंगाई गई।
नागफास से गरुड़ जी ने श्रीरामचन्द्रजी सहित उनकी सेना की जान बचाई।
श्रीरामचन्द्रजी से रावण की मृत्यु नहीं हो रही थी। विभीषण और परमात्मा के सहयोग से रावण का वध हुआ।

माता सीता जी की अग्नि परीक्षा इस आधार पर की गई कि सीता जी ने रावण से सम्बंध नहीं बनाया।
माता सीता अग्नि परीक्षा में सफल हुई। वे पवित्र थी। रावण को भी श्राप लगा हुआ था कि किसी परस्त्री के साथ जबर्दस्ती सम्बन्ध बनायेगा तो तेरी मृत्यु हो जायेगी।

14 वर्ष उपरांत श्रीरामचन्द्रजी अयोध्या लौटे। अयोध्या वासियों ने घी के दीपक जलाये। 
दीपावली मनाई गयी।

एक दिन राजा रामचंद्रजी रात्रि में अयोध्या वासियों के सुख दुःख की जानकारी के लिये रात्रि में भेष बदलकर घूम रहे थे। एक धोभी अपनी पत्नी को लड़ रहा था क्योकि उसकी पत्नी रूठ कर एक दिन के लिये घर से बाहर(अपनी बहन के घर) चली गयी थी। इसी कारण वह उसको पीट रहा था और बोल रहा था कि मैं अयोध्या वाला रामचन्द नहीं जी रावण के पास रहने के बाद भी सीता को घर ले आया।
यह बात श्रीरामचन्द्रजी के चुभ गयी। और उन्होंने सीता जी को घर से निकालने का आदेश दे दिया। सीता जी गिड़गिड़ाती रही। बोलती रही कि मैंने अग्नि परीक्षा दी है स्वामी, मैं निष्कलंक हूँ। लेकिन श्रीरामचन्द्रजी ने एक न सुनी। रामचन्द्र जी ने इतना भी नहीं देखा कि ये गर्भवती है, कहा जायेगी! जनता ताने देती है तो इसमें सीता जी की क्या गलती है। श्रीराम चन्द्र जी तो मर्यादा पुरुषोत्तम भी नहीं थे। यदि वे मर्यादा पुरुषोत्तम होते तो गर्भवती सीता जी को घर से नहीं निकालते। और यदि जनता के तानों की ही चिंता थी तो माता सीता को साथ में लेकर राज त्यागते। इतना भी नहीं सोचा कि अबला नारी जंगल में कहा जायेगी।
ऋषि वाल्मिकी जी ने सीता जी को सहारा दिया। बेटी की तरह पालन किया।
लव कुछ ने श्रीरामचन्द्रजी के अवश्मेघ यज्ञ को स्वीकार किया। सेना सहित श्रीरामचन्द्रजी के छक्के छुड़ा दिये। श्रीरामचन्द्रजी अपने पुत्रों को नहीं पहचान सके।
अंत में सीता जी से भी नहीं मिल सके। नारद जी के श्राप के कारण आजीवन पत्नी वियोग में पड़पते रहे और अंत में सरयू नदी में जल समाधि के बारे में प्राण त्याग दिए।

आपको जानकर हैरानी होगी कि अयोध्या में केवल दो साल दीवाली मनायी गयी। श्रीरामचन्द्रजी जी इस कृत्य (सीता जी निकलने) से अयोध्या वासियों को बहुत दुःख हुआ। 
इसके बाद द्वापर में भी दीवाली नहीं मनाई गयी। कलूँ में स्वार्थी और नकली गुरुओं ने इस पाखण्ड को शुरू किया। और सीता जी बलिदान / दुःख का मजाक शुरू किया।

आप इतना तो समझ गए होंगे जी अयोध्या नरेश श्रीरामचंद्रजी तो पूर्ण परमात्मा / अविनाशी भगवान नहीं हैं।
तो फिर पूर्ण भगवान / आदि राम कौन है जिसने रचना की रचना की है?
कौन हैं असली राम ⁉️🤔
एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घट घट में बैठा।
एक राम का सकल पसारा, एक राम जग से न्यारा ।।

कबीर भगवान ही पूर्ण भगवान / आदि राम ने सब सृष्टि रचना की है। जिनके बारे में कहा जाता है कि सबका मालिक एक है।
पूर्ण परमात्मा कविर्देव / कबीर साहेब चारों युगों (सत, त्रेतागो, द्वापर पीठ, कलगो) में आता है। माँ के गर्भ से जन्म नहीं लेता है। सशरीर आता है, सशरीर जाता है। ना उनका जन्म होता है ना मृत्यु होती है। यही अविनाशी परमात्मा की पहचान होती है 
कबीर साहेब सतना में सतसुकृत नाम से आये थे, त्रेतागो में मुनिंद्र ऋषि नाम से आये थे। तब रावण की पत्नी मन्दोत्री, विभीषण, नल-नील, हनुमानजी सहित कई पुण्यदल ने नाम दीक्षा के बारे में कल्याण का मार्ग अपनाया था।
कबीर भगवान द्वापरगो में करुणामय नाम से आये थे। और कलगो में असली नाम कबीर नाम से आता है। सन्त गरीबदासजी, धर्मदासजी जी, रामानन्द जी, मलूक़दसजी, नानकदेवजी इत्यादि कबीर परमेश्वर के साक्षी बने। परमात्मा ने इन पुण्यिल को सतलोक दिखाया। फिर उन्होंने कबीर परमात्मा की पेंसिल तोड़ महिमा गायी।
कबीर परमात्मा के प्रमाण गीता, क़ुरान, वेद, गुरुग्रंथ साहिओब, बाइबल इत्यादि पवित्र मेग्रथों में भी मिलते हैं।
पूर्ण भगवान की शास्त्र विधि अनुसार सद्भक्ति की जानकारी के लिए अवश्य देखे साधना गृह शाम 7:30 से 8:30 बजे तक।

Wednesday, June 24, 2020

Janmashtami: lord shri krishna

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।

जब जब धर्म की हानि तथा अधर्म(पापकर्म) की वृद्धि होती है तब तब देवता(ब्रह्मा, विष्णु, महेश स्वयं या अवतार धारण कर) पृथ्वी पर जन्म लेते है।
तथा प्रत्येक युग में पूर्ण परमात्मा स्वयं सतलोक से आते है। सशरीर प्रकट होते है, माँ के गर्भ से जन्म नहीं लेते है।
जैसे विष्णुजी ने त्रेतायुग में श्रीरामचन्द्र जी के रूप में अयोध्या के राजा दशरथ के यहाँ जन्म लिया। फिर श्रीविष्णु जी ने ही द्वापरयुग में श्रीकृष्ण जी के रूप में वासुदेव के घर जन्म लिया।
जन्माष्टमी या जन्मोत्सव जन्मदिन उसी का मनाते है जिसने माँ के गर्भ से जन्म लिया हो।
जितने भी देवी देवता है और उनके अवतार है ये सब माँ के गर्भ से ही जन्म लेते है। तथा ये अविनाशी नहीं है अर्थात जन्म मृत्यु में है।
लेकिन पूर्ण परमात्मा कविर्देव/कबीर साहेब जब सतलोक से आते है तो माँ के गर्भ से जन्म नहीं लेते है। सशरीर आते है फिर लीला करके सशरीर जाते है। उनकी जन्म-मृत्यु नहीं होती है। क्योंकि वे अविनाशी है।
श्रीकृष्ण जी की लीलाएं:-
श्रीकृष्ण सहित सभी अवतारी सिद्धियों से युक्त होते है। इसलिए आम इंसानों से अलग होते है।
श्रीकृष्ण जी भी पाखण्ड पूजा के विरोधी थे। इंद्र आदि छोटे देवताओं की भक्ति छुड़वाकर एक परमेश्वर की भक्ति की ओर संकेत किया। इसका इंद्र को दुःख हुआ तो व्रज में मूसलाधार बारिश कर दी। तब श्रीकृष्ण जी ने गोवर्धन पर्वत उठाकर व्रज वासियों की सहायता की।
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Janmashtami


 लेकिन आज मानव समाज एक परमेश्वर को भूलकर पाखण्ड पूजा को ही महत्व दे रहा है। वर्तमान समाज ने उसी गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा देना शुरू कर दिया तथा गोर्वधन के नाम से गोबर पूजना शुरू कर दिया।
श्रीकृष्ण जी ने कंश के द्वारा भेजे गए सभी असुरों का वध कर दिया था।
जरासिन्ध, काल्यवन इत्यादि के साथ युद्ध किया।
श्रीकृष्ण जी पांडवों के धर्मगुरु भी थे।
एक बार श्रीकृष्ण जी ने राजा मोरध्वज के पुत्र ताम्रध्वज को आरे से चिरवाकर जीवित कर दिया था।
धर्मदास जी श्रीकृष्ण जी के भक्त थे। जब उनको पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब मिले तथा सत्य ज्ञान समझाया तब धर्मदास जी ने प्रश्न किया कि हे परमात्मा! श्रीकृष्ण जी भी तो भगवान है। उन्होंने मोरध्वज के पुत्र को आरे से चिरवाया और जीवित कर दिया था। तब कबीर परमेश्वर ने बताया कि हे धर्मदास! मैंने ये नहीं कहा कि श्रीकृष्ण जी भगवान नहीं है। लेकिन ये पूर्ण परमेश्वर नहीं है, समर्थ परमात्मा नहीं है। अविनाशी प्रभु नहीं है। प्रारब्ध को परिवर्तित नहीं कर सकते है। उन्होंने ताम्रध्वज को तो जीवित कर दिया लेकिन अपने भांजे अभिमन्यु को क्यो नहीं जीवित कर सके? अर्जुन रो रहा था, सुभद्रा(श्रीकृष्ण जी की बहन) रो रही थी!
तब धर्मदास ने पूछा कि हे दाता आप ही समझाओ।
तब कबीर परमेश्वर ने बताया कि हे धर्मदास मोरध्वज के पुत्र ताम्रध्वज की आयु शेष थी। इसलिए ये लीला कर दी, इतना तो कोई जादूगर भी कर दे। लेकिन अभिमन्यु की आयु शेष नहीं थी, इसलिए उनको जीवित नहीं किया जा सका।
श्रीकृष्ण जी तीन लोक के स्वामी है, ये पापकर्म/प्रारब्ध को नहीं मिटा सकते। जो लिखा है वो भोगना ही पड़ता है। ये स्वयं के तीन ताप को भी नहीं समाप्त कर सकते। इन्होंने श्रीरामचन्द्र के जन्म में बाली को धोखे से मारा था, फिर बाली की आत्मा शिकारी बना और जानवर समझ कर श्रीकृष्ण जी के पैर में विषाक्त तीर मारा जिससे उनकी मृत्यु हुई।
Janmashtami 2020, श्रीकृष्ण की मृत्यु कैसे हुई
Janmashtami 2020

जबकि मैं(कबीर) असंख्य ब्रह्मांड का स्वामी हूँ, भयँकर पापकर्म को भी समाप्त कर सकता हूँ तथा साधक की आयु भी बढ़ा सकता हूँ।
यह जानकर धर्मदास की आँखे खुल गयी और कबीर परमेश्वर के चरणों मे गिर गया।
फिर कबीर परमेश्वर ने धरमदास जी को सतलोक भी दिखाया, और धर्मदास जी कबीर परमेश्वर के साक्षी बने।
वेदों में भी प्रमाण है पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब/कविर्देव सतलोक से आते है, अच्छी आत्माओ को मिलते है।
सद्भक्ति बताकर काल लोक से पार कराते है। पापकर्म भी समाप्त कर देते है, रोग नाश भी कर देते है, भक्त की आयु भी बढ़ाते है।
कबीर परमेश्वर ने ही द्रोपती की साड़ी बढ़ाई थी। कबीर परमेश्वर ने अँधे साधु का वेश किया था, जल में उनकी कोपीन बह गई थी। तब द्रोपती ने अपनी साड़ी फाड़कर साधु की सहायता की। पुण्य का फल दिया। नाम श्रीकृष्ण जी का हुआ। कबीर परमेश्वर को भी भक्ति को कलयुग तक जीवित रखना था। इसलिए श्रीकृष्ण जी की महिमा होने दिया।
Dropadi cheer haran, mahabharat
Dropadi cheer haran

पहले मीराबाई श्रीकृष्ण जी को सर्वशक्तिमान मानकर उनकी भक्ति करती थी। फिर कबीर परमेश्वर ने सत्संग के माध्यम से बताया कि श्रीकृष्ण जी अविनाशी परमात्मा नहीं है और उनकी भक्ति से मोक्ष नहीं होगा। पहले तो मीराबाई को विश्वास नहीं हुआ। क्योकि श्रीकृष्ण मीराबाई को दर्शन देते थे, बात करते थे। फिर कबीर परमात्मा ने मीराबाई से कहा कि आप कृष्ण जी से ही पूछना, ये देवता झूठ नहीं बोलते है। जब मीराबाई ने कृष्ण जी से पूछा तो उन्होंने बताया कि मीरा ये सत्य है लेकिन मुझे उस सर्व शक्तिमान के बारे में जानकारी नहीं है।
तब मीराबाई ने गुरु बनाया और कबीर परमेश्वर की भक्ति अपनायी।
meera bai bhajan, radha krishna
Meera bai bhajan

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।
वस्तु अमोलक दी मेरे सदगुरु किरपा कर अपनायो।। -(मीरा के पद)
महाभारत के युद्ध के बाद पांडवों को पाप लगा, तब श्रीकृष्ण ने उपाय बताया कि यज्ञ कराओ और सभी साधु संतों को भंडारे का लिये आमंत्रित करो, भोजन करने पर पंचमुखी शंख बजेगा तब यज्ञ सफल होगा। उसी से पाप कटेगा। सबने भोजन कर लिया, श्रीकृष्ण जी ने भी भोजन कर लिया लेकिन शंख नहीं बजा। फिर कबीर परमेश्वर ने अपने शिष्य सुपच सुदर्शन का रूप धारण कर भंडारा किया, तब शंख बजा और यज्ञ सफल हुआ।
पांडवों का यज्ञ, स्वर्गलोक
Mahabharat katha

कबीर परमेश्वर कहते है-
तीन गुणों की भक्ति में, भूल पड़्यो संसार।
कह कबीर निज नाम बिन, कैसे उतरो पार।।
केवल एक परमेश्वर(पूर्ण परमात्मा) कबीर साहेब की शास्त्रविधि अनुसार सद्भक्ति से ही सर्व लाभ तथा मोक्ष की प्राप्ति सम्भव है। अन्य देवता पापकर्म दण्ड/प्रारब्ध को समाप्त नहीं कर सकते है। केवल कबीर परमेश्वर ही प्रारब्ध/भाग्य में लिखे को परिवर्तित कर सकते है।

अधिक जानकारी के लिए देखे साधना चेनल शाम 7:30 बजे।