यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।
जब जब धर्म की हानि तथा अधर्म(पापकर्म) की वृद्धि होती है तब तब देवता(ब्रह्मा, विष्णु, महेश स्वयं या अवतार धारण कर) पृथ्वी पर जन्म लेते है।
तथा प्रत्येक युग में पूर्ण परमात्मा स्वयं सतलोक से आते है। सशरीर प्रकट होते है, माँ के गर्भ से जन्म नहीं लेते है।
जैसे विष्णुजी ने त्रेतायुग में श्रीरामचन्द्र जी के रूप में अयोध्या के राजा दशरथ के यहाँ जन्म लिया। फिर श्रीविष्णु जी ने ही द्वापरयुग में श्रीकृष्ण जी के रूप में वासुदेव के घर जन्म लिया।
जन्माष्टमी या जन्मोत्सव जन्मदिन उसी का मनाते है जिसने माँ के गर्भ से जन्म लिया हो।
जितने भी देवी देवता है और उनके अवतार है ये सब माँ के गर्भ से ही जन्म लेते है। तथा ये अविनाशी नहीं है अर्थात जन्म मृत्यु में है।
लेकिन पूर्ण परमात्मा कविर्देव/कबीर साहेब जब सतलोक से आते है तो माँ के गर्भ से जन्म नहीं लेते है। सशरीर आते है फिर लीला करके सशरीर जाते है। उनकी जन्म-मृत्यु नहीं होती है। क्योंकि वे अविनाशी है।
श्रीकृष्ण जी की लीलाएं:-
श्रीकृष्ण सहित सभी अवतारी सिद्धियों से युक्त होते है। इसलिए आम इंसानों से अलग होते है।
श्रीकृष्ण जी भी पाखण्ड पूजा के विरोधी थे। इंद्र आदि छोटे देवताओं की भक्ति छुड़वाकर एक परमेश्वर की भक्ति की ओर संकेत किया। इसका इंद्र को दुःख हुआ तो व्रज में मूसलाधार बारिश कर दी। तब श्रीकृष्ण जी ने गोवर्धन पर्वत उठाकर व्रज वासियों की सहायता की।
लेकिन आज मानव समाज एक परमेश्वर को भूलकर पाखण्ड पूजा को ही महत्व दे रहा है। वर्तमान समाज ने उसी गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा देना शुरू कर दिया तथा गोर्वधन के नाम से गोबर पूजना शुरू कर दिया।
श्रीकृष्ण जी ने कंश के द्वारा भेजे गए सभी असुरों का वध कर दिया था।
जरासिन्ध, काल्यवन इत्यादि के साथ युद्ध किया।
श्रीकृष्ण जी पांडवों के धर्मगुरु भी थे।
एक बार श्रीकृष्ण जी ने राजा मोरध्वज के पुत्र ताम्रध्वज को आरे से चिरवाकर जीवित कर दिया था।
धर्मदास जी श्रीकृष्ण जी के भक्त थे। जब उनको पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब मिले तथा सत्य ज्ञान समझाया तब धर्मदास जी ने प्रश्न किया कि हे परमात्मा! श्रीकृष्ण जी भी तो भगवान है। उन्होंने मोरध्वज के पुत्र को आरे से चिरवाया और जीवित कर दिया था। तब कबीर परमेश्वर ने बताया कि हे धर्मदास! मैंने ये नहीं कहा कि श्रीकृष्ण जी भगवान नहीं है। लेकिन ये पूर्ण परमेश्वर नहीं है, समर्थ परमात्मा नहीं है। अविनाशी प्रभु नहीं है। प्रारब्ध को परिवर्तित नहीं कर सकते है। उन्होंने ताम्रध्वज को तो जीवित कर दिया लेकिन अपने भांजे अभिमन्यु को क्यो नहीं जीवित कर सके? अर्जुन रो रहा था, सुभद्रा(श्रीकृष्ण जी की बहन) रो रही थी!
तब धर्मदास ने पूछा कि हे दाता आप ही समझाओ।
तब कबीर परमेश्वर ने बताया कि हे धर्मदास मोरध्वज के पुत्र ताम्रध्वज की आयु शेष थी। इसलिए ये लीला कर दी, इतना तो कोई जादूगर भी कर दे। लेकिन अभिमन्यु की आयु शेष नहीं थी, इसलिए उनको जीवित नहीं किया जा सका।
श्रीकृष्ण जी तीन लोक के स्वामी है, ये पापकर्म/प्रारब्ध को नहीं मिटा सकते। जो लिखा है वो भोगना ही पड़ता है। ये स्वयं के तीन ताप को भी नहीं समाप्त कर सकते। इन्होंने श्रीरामचन्द्र के जन्म में बाली को धोखे से मारा था, फिर बाली की आत्मा शिकारी बना और जानवर समझ कर श्रीकृष्ण जी के पैर में विषाक्त तीर मारा जिससे उनकी मृत्यु हुई।
जबकि मैं(कबीर) असंख्य ब्रह्मांड का स्वामी हूँ, भयँकर पापकर्म को भी समाप्त कर सकता हूँ तथा साधक की आयु भी बढ़ा सकता हूँ।
यह जानकर धर्मदास की आँखे खुल गयी और कबीर परमेश्वर के चरणों मे गिर गया।
फिर कबीर परमेश्वर ने धरमदास जी को सतलोक भी दिखाया, और धर्मदास जी कबीर परमेश्वर के साक्षी बने।
वेदों में भी प्रमाण है पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब/कविर्देव सतलोक से आते है, अच्छी आत्माओ को मिलते है।
सद्भक्ति बताकर काल लोक से पार कराते है। पापकर्म भी समाप्त कर देते है, रोग नाश भी कर देते है, भक्त की आयु भी बढ़ाते है।
कबीर परमेश्वर ने ही द्रोपती की साड़ी बढ़ाई थी। कबीर परमेश्वर ने अँधे साधु का वेश किया था, जल में उनकी कोपीन बह गई थी। तब द्रोपती ने अपनी साड़ी फाड़कर साधु की सहायता की। पुण्य का फल दिया। नाम श्रीकृष्ण जी का हुआ। कबीर परमेश्वर को भी भक्ति को कलयुग तक जीवित रखना था। इसलिए श्रीकृष्ण जी की महिमा होने दिया।
पहले मीराबाई श्रीकृष्ण जी को सर्वशक्तिमान मानकर उनकी भक्ति करती थी। फिर कबीर परमेश्वर ने सत्संग के माध्यम से बताया कि श्रीकृष्ण जी अविनाशी परमात्मा नहीं है और उनकी भक्ति से मोक्ष नहीं होगा। पहले तो मीराबाई को विश्वास नहीं हुआ। क्योकि श्रीकृष्ण मीराबाई को दर्शन देते थे, बात करते थे। फिर कबीर परमात्मा ने मीराबाई से कहा कि आप कृष्ण जी से ही पूछना, ये देवता झूठ नहीं बोलते है। जब मीराबाई ने कृष्ण जी से पूछा तो उन्होंने बताया कि मीरा ये सत्य है लेकिन मुझे उस सर्व शक्तिमान के बारे में जानकारी नहीं है।
तब मीराबाई ने गुरु बनाया और कबीर परमेश्वर की भक्ति अपनायी।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।
वस्तु अमोलक दी मेरे सदगुरु किरपा कर अपनायो।। -(मीरा के पद)
महाभारत के युद्ध के बाद पांडवों को पाप लगा, तब श्रीकृष्ण ने उपाय बताया कि यज्ञ कराओ और सभी साधु संतों को भंडारे का लिये आमंत्रित करो, भोजन करने पर पंचमुखी शंख बजेगा तब यज्ञ सफल होगा। उसी से पाप कटेगा। सबने भोजन कर लिया, श्रीकृष्ण जी ने भी भोजन कर लिया लेकिन शंख नहीं बजा। फिर कबीर परमेश्वर ने अपने शिष्य सुपच सुदर्शन का रूप धारण कर भंडारा किया, तब शंख बजा और यज्ञ सफल हुआ।
कबीर परमेश्वर कहते है-
तीन गुणों की भक्ति में, भूल पड़्यो संसार।
कह कबीर निज नाम बिन, कैसे उतरो पार।।
केवल एक परमेश्वर(पूर्ण परमात्मा) कबीर साहेब की शास्त्रविधि अनुसार सद्भक्ति से ही सर्व लाभ तथा मोक्ष की प्राप्ति सम्भव है। अन्य देवता पापकर्म दण्ड/प्रारब्ध को समाप्त नहीं कर सकते है। केवल कबीर परमेश्वर ही प्रारब्ध/भाग्य में लिखे को परिवर्तित कर सकते है।
अधिक जानकारी के लिए देखे साधना चेनल शाम 7:30 बजे।
अभ्युत्थानधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।
जब जब धर्म की हानि तथा अधर्म(पापकर्म) की वृद्धि होती है तब तब देवता(ब्रह्मा, विष्णु, महेश स्वयं या अवतार धारण कर) पृथ्वी पर जन्म लेते है।
तथा प्रत्येक युग में पूर्ण परमात्मा स्वयं सतलोक से आते है। सशरीर प्रकट होते है, माँ के गर्भ से जन्म नहीं लेते है।
जैसे विष्णुजी ने त्रेतायुग में श्रीरामचन्द्र जी के रूप में अयोध्या के राजा दशरथ के यहाँ जन्म लिया। फिर श्रीविष्णु जी ने ही द्वापरयुग में श्रीकृष्ण जी के रूप में वासुदेव के घर जन्म लिया।
जन्माष्टमी या जन्मोत्सव जन्मदिन उसी का मनाते है जिसने माँ के गर्भ से जन्म लिया हो।
जितने भी देवी देवता है और उनके अवतार है ये सब माँ के गर्भ से ही जन्म लेते है। तथा ये अविनाशी नहीं है अर्थात जन्म मृत्यु में है।
लेकिन पूर्ण परमात्मा कविर्देव/कबीर साहेब जब सतलोक से आते है तो माँ के गर्भ से जन्म नहीं लेते है। सशरीर आते है फिर लीला करके सशरीर जाते है। उनकी जन्म-मृत्यु नहीं होती है। क्योंकि वे अविनाशी है।
श्रीकृष्ण जी की लीलाएं:-
श्रीकृष्ण सहित सभी अवतारी सिद्धियों से युक्त होते है। इसलिए आम इंसानों से अलग होते है।
श्रीकृष्ण जी भी पाखण्ड पूजा के विरोधी थे। इंद्र आदि छोटे देवताओं की भक्ति छुड़वाकर एक परमेश्वर की भक्ति की ओर संकेत किया। इसका इंद्र को दुःख हुआ तो व्रज में मूसलाधार बारिश कर दी। तब श्रीकृष्ण जी ने गोवर्धन पर्वत उठाकर व्रज वासियों की सहायता की।
![]() |
| Janmashtami |
लेकिन आज मानव समाज एक परमेश्वर को भूलकर पाखण्ड पूजा को ही महत्व दे रहा है। वर्तमान समाज ने उसी गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा देना शुरू कर दिया तथा गोर्वधन के नाम से गोबर पूजना शुरू कर दिया।
श्रीकृष्ण जी ने कंश के द्वारा भेजे गए सभी असुरों का वध कर दिया था।
जरासिन्ध, काल्यवन इत्यादि के साथ युद्ध किया।
श्रीकृष्ण जी पांडवों के धर्मगुरु भी थे।
एक बार श्रीकृष्ण जी ने राजा मोरध्वज के पुत्र ताम्रध्वज को आरे से चिरवाकर जीवित कर दिया था।
धर्मदास जी श्रीकृष्ण जी के भक्त थे। जब उनको पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब मिले तथा सत्य ज्ञान समझाया तब धर्मदास जी ने प्रश्न किया कि हे परमात्मा! श्रीकृष्ण जी भी तो भगवान है। उन्होंने मोरध्वज के पुत्र को आरे से चिरवाया और जीवित कर दिया था। तब कबीर परमेश्वर ने बताया कि हे धर्मदास! मैंने ये नहीं कहा कि श्रीकृष्ण जी भगवान नहीं है। लेकिन ये पूर्ण परमेश्वर नहीं है, समर्थ परमात्मा नहीं है। अविनाशी प्रभु नहीं है। प्रारब्ध को परिवर्तित नहीं कर सकते है। उन्होंने ताम्रध्वज को तो जीवित कर दिया लेकिन अपने भांजे अभिमन्यु को क्यो नहीं जीवित कर सके? अर्जुन रो रहा था, सुभद्रा(श्रीकृष्ण जी की बहन) रो रही थी!
तब धर्मदास ने पूछा कि हे दाता आप ही समझाओ।
तब कबीर परमेश्वर ने बताया कि हे धर्मदास मोरध्वज के पुत्र ताम्रध्वज की आयु शेष थी। इसलिए ये लीला कर दी, इतना तो कोई जादूगर भी कर दे। लेकिन अभिमन्यु की आयु शेष नहीं थी, इसलिए उनको जीवित नहीं किया जा सका।
श्रीकृष्ण जी तीन लोक के स्वामी है, ये पापकर्म/प्रारब्ध को नहीं मिटा सकते। जो लिखा है वो भोगना ही पड़ता है। ये स्वयं के तीन ताप को भी नहीं समाप्त कर सकते। इन्होंने श्रीरामचन्द्र के जन्म में बाली को धोखे से मारा था, फिर बाली की आत्मा शिकारी बना और जानवर समझ कर श्रीकृष्ण जी के पैर में विषाक्त तीर मारा जिससे उनकी मृत्यु हुई।
![]() |
| Janmashtami 2020 |
जबकि मैं(कबीर) असंख्य ब्रह्मांड का स्वामी हूँ, भयँकर पापकर्म को भी समाप्त कर सकता हूँ तथा साधक की आयु भी बढ़ा सकता हूँ।
यह जानकर धर्मदास की आँखे खुल गयी और कबीर परमेश्वर के चरणों मे गिर गया।
फिर कबीर परमेश्वर ने धरमदास जी को सतलोक भी दिखाया, और धर्मदास जी कबीर परमेश्वर के साक्षी बने।
वेदों में भी प्रमाण है पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब/कविर्देव सतलोक से आते है, अच्छी आत्माओ को मिलते है।
सद्भक्ति बताकर काल लोक से पार कराते है। पापकर्म भी समाप्त कर देते है, रोग नाश भी कर देते है, भक्त की आयु भी बढ़ाते है।
कबीर परमेश्वर ने ही द्रोपती की साड़ी बढ़ाई थी। कबीर परमेश्वर ने अँधे साधु का वेश किया था, जल में उनकी कोपीन बह गई थी। तब द्रोपती ने अपनी साड़ी फाड़कर साधु की सहायता की। पुण्य का फल दिया। नाम श्रीकृष्ण जी का हुआ। कबीर परमेश्वर को भी भक्ति को कलयुग तक जीवित रखना था। इसलिए श्रीकृष्ण जी की महिमा होने दिया।
![]() |
| Dropadi cheer haran |
पहले मीराबाई श्रीकृष्ण जी को सर्वशक्तिमान मानकर उनकी भक्ति करती थी। फिर कबीर परमेश्वर ने सत्संग के माध्यम से बताया कि श्रीकृष्ण जी अविनाशी परमात्मा नहीं है और उनकी भक्ति से मोक्ष नहीं होगा। पहले तो मीराबाई को विश्वास नहीं हुआ। क्योकि श्रीकृष्ण मीराबाई को दर्शन देते थे, बात करते थे। फिर कबीर परमात्मा ने मीराबाई से कहा कि आप कृष्ण जी से ही पूछना, ये देवता झूठ नहीं बोलते है। जब मीराबाई ने कृष्ण जी से पूछा तो उन्होंने बताया कि मीरा ये सत्य है लेकिन मुझे उस सर्व शक्तिमान के बारे में जानकारी नहीं है।
तब मीराबाई ने गुरु बनाया और कबीर परमेश्वर की भक्ति अपनायी।
![]() |
| Meera bai bhajan |
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।
वस्तु अमोलक दी मेरे सदगुरु किरपा कर अपनायो।। -(मीरा के पद)
महाभारत के युद्ध के बाद पांडवों को पाप लगा, तब श्रीकृष्ण ने उपाय बताया कि यज्ञ कराओ और सभी साधु संतों को भंडारे का लिये आमंत्रित करो, भोजन करने पर पंचमुखी शंख बजेगा तब यज्ञ सफल होगा। उसी से पाप कटेगा। सबने भोजन कर लिया, श्रीकृष्ण जी ने भी भोजन कर लिया लेकिन शंख नहीं बजा। फिर कबीर परमेश्वर ने अपने शिष्य सुपच सुदर्शन का रूप धारण कर भंडारा किया, तब शंख बजा और यज्ञ सफल हुआ।
![]() |
| Mahabharat katha |
कबीर परमेश्वर कहते है-
तीन गुणों की भक्ति में, भूल पड़्यो संसार।
कह कबीर निज नाम बिन, कैसे उतरो पार।।
केवल एक परमेश्वर(पूर्ण परमात्मा) कबीर साहेब की शास्त्रविधि अनुसार सद्भक्ति से ही सर्व लाभ तथा मोक्ष की प्राप्ति सम्भव है। अन्य देवता पापकर्म दण्ड/प्रारब्ध को समाप्त नहीं कर सकते है। केवल कबीर परमेश्वर ही प्रारब्ध/भाग्य में लिखे को परिवर्तित कर सकते है।
अधिक जानकारी के लिए देखे साधना चेनल शाम 7:30 बजे।




